पंचर तंत्र

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

हम सबकी मुम्बई

मुबंई महाराष्ट्र की राजधानी ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति के सपनों की नगरी भी है। बालीवुड के पसंदीदा सितारों को देखने की चाहत और जुहू चैपाटी के समन्दर का अद्वितीय दृश्य रोज हजारों लोगों को इस मायानगरी में खींच लाता है।

लेकिन शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसी पार्टियों ने इस शहर को भाषा और जाति के बंधन में बांध कर रख दिया है। दरअसल यह हर भारतवासी के व्यक्तिगत एंव संवैधानिक अधिकारों का हनन है। सम्मान एक ऐसी भावना है जो व्यक्ति के हृदय में स्वंय पनपती है। इन पार्टियों को समझ लेना चाहिये कि मुबंई सिर्फ मराठी मानुष की ही नहीं बल्कि हम सभी की है। अतः जाति या भाषा के प्रति जोर जबरदस्ती करके आदर पैदा करवाने का प्रयास इन पार्टियों को बन्द कर देना चाहिये।

भारत का प्रत्येक शहर अनूठे संस्कारों एंव अनमोल संस्कृतियों को अपने भीतर संजोये हुये है और भारत का नागरिक होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह देश की सम्प्रभुता को बरकरार रखते हुये इन संस्कृतियों का सम्मान करे।
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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

सम्मान का अपमान



पदमश्री पुरस्कार भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला एक ऐसा सम्मान है जो उन भारतीयों को प्रदान किया जाता है जो कला, विज्ञानं, साहित्य, समाज सेवा आदि क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान देते हैं । नर्गिस, सत्यजीत रे, कपिल देव, रामानंद सागर, प्रकाश पादुकोण जैसे नामचीन हस्तियों को इस सम्मान से नवाज़ा जा चुका है । इस सम्मान को प्राप्त करना अत्यंत गौरव का विषय है । लेकिन इस बार सरकार ने एक ऐसे व्यक्ति को इस सम्मान का हक़दार बनाया है जिसकी प्रष्ठभूमि आतंक से जुडी हुई है । गुलाम मोहम्मद मीर उर्फ़ मम कन्ना नामक पूर्व आतंकी को यह पुरस्कार प्रदान किया जाना इस सम्मान का अपमान है । सरकार का दावा है कि स्वयम आतंक का पर्याय रह चुके इस शख्स ने आतंकवाद का खात्मा करने में मदद की है । लेकिन सच्चाई तो यह है कि गुलाम मोहम्मद मानवाधिकारों के हनन, जमीन पर कब्जे, जंगलों की अवैध कटाई जैसे मामलों में वांछित है ।


इससे तो ऐसा ही लगता है की या तो भारत सरकार ऐसे पुरस्कार प्रदान करते समय पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है और या फिर देश में साफ़ सुथरी छवि वाला कोई शख्स बाकी नहीं है जिसे यह सम्मानजनक उपाधि दी जा सके।

posted by ॐβĤĂV¥Åॐ at 11:19 pm 1 comments