पंचर तंत्र
मंगलवार, 22 जुलाई 2008
बच्चे और बचपन
गर्मियों की छुटियाँ ख़त्म हो चुकी है परन्तु शहर में बच्चों के लिए एक्टिविटी कैंप अब भी चल रहे है । माता पिता पढाई के साथ साथ अपने बच्चों को डांसिंग, सिंगिंग तथा स्पोर्ट्स आदि सिखाने के लिए पूरी मेहनत कर रहे है । बच्चों का टाइम टेबल काफी बदल चुका है । अब उनकी दिनचर्या में पढाई और खेलकूद के साथ ही स्कूल के पश्चात् लगने वाली क्लासेस में घंटो पसीना बहाना भी शामिल हो गया है । ऐसा लगता है मानो बच्चों को सर्वगुण संपन्न बनाने की कोई प्रतिस्पर्धा चल रही हो । माता पिता तथा उनके बच्चों के प्रयासों से लक्ष्य की प्राप्ति तो हो जाती है लेकिन इन सब में बच्चों का बचपन कहीं गुम हो जाता है । आज छोटे छोटे बच्चों में भी भोलेपन और बचपने के दर्शन नही होते है । बच्चो की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि उनके पास स्वयं से वस्तुओं का प्रेक्षण कर सीखने का वक्त ही नही है । बच्चों के मध्य परफेक्ट बनने की चाह इस कदर हावी हो गई है कि अहम् ,टकराव ,हिंसा ,प्रतिस्पर्धा जैसे नकारात्मक गुण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुके है । माँ बाप की आशाओं पर खरा उतरने के लिए बच्चे एडी चोटी का ज़ोर लगा देते है परन्तु परेशानियों का प्रारंभ होता है उनकी असफलताओं से । इन परेशानियों का अंत दमन ,क्रोध तथा आत्महत्या जितना गंभीर होता है । अतः वर्त्तमान समाज में एक ऐसे संशोधन कि आवश्यकता है जिसमे बच्चों को बच्चा समझ कर व्यव्हार किया जाए .
posted by ॐβĤĂV¥Åॐ at 1:41 am

2 Comments:
अतः वर्त्तमान समाज में एक ऐसे संशोधन कि आवश्यकता है जिसमे बच्चों को बच्चा समझ कर व्यव्हार किया जाए .
-बिल्कुल सही कहा आपने.
aapne sahi likha hai, aaj kal k bachcho k pas bachpan nam ki koi chij nahi rah gayi hai.
yun hi likhte rahiye.
aapka padosi
vishalvermaa.blogspot.com
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