पंचर तंत्र
गुरुवार, 10 जुलाई 2008
पुलिस का यही चरित्र

दिल्ली से सटे नॉएडा के एक घर में १४ वर्षीय किशोरी और ४० वर्षीय नौकर की हत्या का राज़ न सुलझा पाना हमारी निकम्मी पुलिस की पोल खोलता है। पुलिस ने सर्वप्रथम किशोरी के पिता को पकड़ा फिर नौकर को और अब किसी तीसरे को। मृतका के माता -पिता को शक के दायरे में डालने के बाद भूसे में सुई ढूँढने की कला में पुलिस ने पुरे भूसे को ही इस कदर छितरा दिया है कि सारे सबूत नष्ट हो गए।
जब घर में दो दो हत्याएं हो जायें और बाद में पुलिस केवल ख़ाक छानती फिरे ,इससे अधिक डरावनी बात क्या हो सकती है ? डरावनी इसलिए कि जो पुलिस घर कि चार दीवारों के भीतर हुई हत्याओं को नही सुलझा सकती ,वह आतंकवादी घटनाओ को अंजाम देने वाले अपराधियों को आखिर कैसे पकड़ सकती है। यह मामला तो लाखों मामलों में से एक उदाहरण मात्र है जो पुलिस के असली चरित्र को उजागर करता है।
पुलिस का यही चरित्र है कि अपराध होने पर २-४ व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लो ,गवाह होने या ना होने पर भी मुकदमा चला दो और हो गई पुलिसिया कारवाही खत्म। पुलिस जानती है कि उसे तो गिरफ्तारी के पहले दिन इनाम मिल जाएगा क्यूंकि कैदी को जेल में होने वाली परेशानियों से बचाने के लिए पारिवारिक सदस्य रिश्वत के रूप में भुगतान करना ही पड़ेगा, भले ही अमुक व्यक्ति अपराधी हो अथवा नही।
हमारी पुलिस भी जनता तथा मीडिया कि आलोचनाओं की इतनी आदी हो गई है कि कोई भी बात उस पर असर नही करती। सरकार भी दबाव बढ़ जाने पर ज्यादा से ज्यादा उनके तबादले कर देती है पर इसका भी कोई ख़ास असर नही होता क्यूंकि तबादले तो शरीफ और ईमानदार अफसरों के होते है। तबादले तो मेडल होता है सजा नही।
अतः नॉएडा में घटित हुए हत्याकांड में गुनाहगार सिर्फ़ वह व्यक्ति नही है जो उस घटना को अंजाम दे कर भी छुपा हुआ है ,बल्कि अपराधी वे सब भी है जो उसे आज तक पकड़ नही पाए है।
posted by ॐβĤĂV¥Åॐ at 11:11 am

0 Comments:
एक टिप्पणी भेजें
<< Home